निरंतर वीडियो

जहां हम मिलकर वीडियो बनाते हैं, उसे संजोते हैं और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के ज़रिए हिन्दुस्तान के छिपे और अनदेखे पहलुओं को सामने लाते हैं.

चरवाहों की निगाह में शहर

चरवाहों की निगाह में शहर

क्या आपने अपने शहर में चरवाहों को आते-जाते देखा है? अब तक की ज़िंदगी में उन्हें कहां-कहां देखा है? हम में से बहुत सारे लोगों के लिए इन सवालों का जवाब ‘न’ भी हो सकता है क्योंकि असल में चरवाहों की आजीविका को विकास के एजेंडे में अलग-थलग या अजीब माना जाता है. शहरीकरण की हमारी कल्पना में वे सिरे से गायब दिखाई देते हैं.

केसवर्कर्स_महिला हिंसा

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 09: दो ज़िले, चार केसवर्कर्स

सीरीज़ के इस एपिसोड में मिलिए चार केसवर्कर्स से- सद्भावना ट्रस्ट से तबस्सुम और हुमा, सहजनी शिक्षा केंद्र से राजकुमारी और वनांगना संस्था से शोभा.

पढ़ना

स्कूल लौटती दो बुज़ुर्ग महिलाओं की बेजोड़ कहानी

शुवांगी खड़का की फ़िल्म ‘पढ्ने उमेर’ नेपाल में प्रौढ़ शिक्षा पर केंद्रित है. द थर्ड आई के साथ शुरुआती बातचीत में शुवांगी अपनी मां की कहानी कहना चाहती थीं. मां को भी पढ़ने का शौक है लेकिन घर-गृहस्थी में उलझकर उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई. शुवांगी, खुद अपनी मां से यह सवाल करती हैं कि उन्होंने पढ़ना क्यों छोड़ दिया? पर, फ़िल्म शूट करने के दौरान उन्हें अपने इस सवाल का जवाब मिल जाता है.

सलीम किदवई

“प्रतिरोध की राजनीति ‘मज़ा’ के बिना अधूरी है.”

सलीम किदवई एक इतिहासकार और स्वतंत्र विद्वान थे, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में बीस वर्षों तक अध्यापन किया है. उन्होंने मध्यकालीन और आधुनिक भारत पर कई अकादमिक निबंध प्रकाशित किए हैं और कई कृतियों का अनुवाद किया है, जिनमें मलका पुखराज द्वारा लिखित “सॉन्ग सुंग ट्रू: ए मेमॉयर” और सैयद रफीक हुसैन की लघु कथाओं का संग्रह “द मिरर ऑफ वंडर्स” शामिल हैं.

नदी

एक नदी थी, दोनों किनारे थाम कर बैठी थी

तबस्सुम की एक दोस्त ने उसे नदी के बारे में बताया था. “ नदी के पास पहुंचकर जो पहली चीज़ मैंने देखी वो था कूड़ा. मैंने सोचा अब मैं क्या शूट करूं! पर फिर मैं एक जगह शांति से बैठकर आसपास की हलचलों को देखने लगी, उन्हें महसूस करने लगी.

हिंसा_जागरूकता

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 08 – मंजू सोनी

मिलिए मंजू सोनी से जो बांदा, उत्तर-प्रदेश की रहनेवाली है. मंजू, 2000 से वनांगना संस्था के साथ काम कर रही हैं. पिछले पांच साल से वे संस्था में जेंडर आधारित हिंसा के मामलों में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं.

अवधेश गुप्ता

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 07 – अवधेश गुप्ता

केसवर्कर्स के साथ मुलाकात के इस एपिसोड में मिलिए बांदा, उत्तर-प्रदेश की रहने वाली अवधेश गुप्ता से, जो 1995 से वनांगना संस्था के साथ बतौर केसवर्कर काम कर रही हैं.

मदरसा

दरस का पेड़

वो कौतूहल ही था जिसने अशरफ हुसैन और अज़फरूल शेख के कदमों को उधर की ओर मोड़ दिया जिधर स्थानीय मदरसा हुआ करता है और जिसके पास से वे अक्सर गुज़रा करते थे, पर अंदर जाने का मौका नहीं मिलता था.

जाति

हमारे बीच में

हमारे बीच में, दो महिलाओं के जीवन में जाति की रेखाओं को टटोलने और उसे पर्दे पर उभारने की यात्रा है. जाति पर फिल्म कैसे बनाते हैं? क्या है जो हम दिखा सकते हैं और क्या नहीं? गुस्सा, खीझ, अपमान जैसी भावनाओं को पर्दें पर कैसे दिखाया जाता है?

वायलेंस_ललितपुर

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 06 – कुसुम

केसवर्कर्स से मुलाकात के इस एपिसोड में मिलिए महरौनी, उत्तर-प्रदेश की रहने वाली कुसुम से, जो महरौनी स्थित सहजनी शिक्षा केंद्र के साथ 2008 से काम कर रही हैं.
अपने अनुभवों को साझा करते हुए कुसुम बताती हैं, “एलएलबी तो हमने नहीं की है, इनसे तो हम बहुत दूर हैं लेकिन हमें पता है कि किस केस में किस तरह की धारा लगना चाहिए.”